भारतीयता या विदेशियता


विदेशी चीजों से भारतीयों को बहुत प्यार है | हम उसे बड़ी आसानी से अपना लेते है | चाहे हो भाषा हो, तकनीकी हो , बाला हो या आलोचना| इसके प्रभाव अच्छे और बुरे दोनों हो सकते है | अगर हम दूसरों की अच्छी चीजें अपनाये और बुरी चीजों को छोड़ दे तो इस से अच्छा तो कुछ हो ही नहीं सकता , परन्तु अगर विश्लेषण करेंगे तो हम पायेंगे की हम बुरी चीजों को ज्यादा मात्रा में अपनाते है और अच्छी चीजों की तरफ कम ही ध्यान देते है | ये हमारी व्यक्तिगत जिंदगी में भी उतना ही लागू होती है जितना एक देश के लिए |

हम ये सोचने में तनिक सा भी समय नहीं देते की उस का गुण क्या है ? क्या वो हमारे लिए उपयोगी है ? क्या वो हमारे लिए फायदेमंद है ? क्या वो हमारे राष्ट्र-हित में है ?

तभी तो आपने देखा होगा हमारे अखबार भी तो विदेशों से कितने खबरे उठाते है जबकि भारत के बहुत से हिस्से की कब खबरे हम कभी सुनते ही नहीं | यही करना है की हमें उत्तर-पूर्व के राज्यों से ज्यादा पाकिस्तान की ,बंगलादेश की , अमेरिका और चीन की खबरे देखेने को मिलती है | टीवी चैनलो के लिए तो शायद दिल्ली से बाहर भारत का कोई अस्तित्व ही न हो| ये देखने में भले ही आम या साधारण बातें लगे परन्तु ये एक बड़ी मानसिकता का संकेत है जो देश के भविष्य निर्धारण में बहुत बड़ा योगदान देती है | शायद भारत उन सब देशो में अकेला ऐशा देश होगा जो एक महाशक्ति बननें का ख्वाब देखता है परन्तु अपनी संस्कृति,इतिहास, भाषा, धर्म, संस्कार,शिक्षा, प्राचीन ज्ञान सब को एक तिरस्कार की नज़र से देखते है | यह भी एक हकीकत है की कोई भी देख अपने पुरातन को भूल के विकास नहीं कर पाया है , वो एक महाशक्ति नहीं बन पाया है |

अगर अमेरिका का कोई अखबार भारत सरकार की आलोचना करेगा तो न केवल सब अखबार उसे प्रमुखता से प्रकाशित करेंगे बल्कि हमारे देखे के बुद्दिजीवीलोग उसे बड़े चाव के साथ फेसबुक और ट्विट्टर पर साझा करेंगे | साथ की टिप्पणी में वो इसका स्पस्टीकरण भी देगे| वो इस अवसर को भुनाने की कोशिश करेंगे| वो कहेंगे हमने कहा था ना , ये सरकार सही नहीं काम कर रही है |

इसी का एक नमूना अभी देखने को मिला जब अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पहले अपने दिल्ली के भाषण में ‘धार्मिक-स्वतंत्रा’ का जिक्र किया और बाद में ये कहा की “भारत में धार्मिक असहिष्णुता को देखकर गांधीजी भी अचम्भित हो जाते “| शायद ओबामा जी ये भूल गए की ‘भारत एक सम्प्रभुव और स्वतंत्र राष्ट्र है’ और ‘किसी भी देश के प्रमुख को ये लब्ज प्रयोग करने से पहले बहुत सोच विचार करने की जरुरत है’ | यही ओबामा जी सउदी अरेबिया में धार्मिक स्वतंत्रा पे कुछ नहीं बोलते, वहा उन्हें धार्मिक असहिष्णुता याद नही आती |

वैसे देखे तो ये सीधा-२ देश के आंतरिक मामलो में हस्तक्षेप है | इस की कड़े शब्दों में सभी भारतीयों द्वारा निंदा करनी चाहिए परन्तु वास्तव में कुछ राजनेतिक दलों, बुधिजीवो , पत्रकारों ने इस कथन का प्रयोग मोजूदा सरकार पर हमला करने के लिये किया | ये बहुत ही दुर्भाग्य-पूरण है|

इसका मतलब कतई ये नहीं है की हमारे बिच वैचारिक मतभेद नहीं हो सकते परन्तु जब भी कोई विदेशी ताकत हमारे मतभेद का फायदा उठाने की कोशिश करे तब हम सब भारतीयों को इसकी पुरजोर निंदा करनी चाहिए , ना की उनकी चल का हिस्सा बन न चाहिए |

इसी कमी का अंग्रेजो ने फायदा उठाया था | इसी का फायदा विदेशी ताकते अभी उठाने में लगी है |

जब तक हम इस मानसिकता से बाहर नहीं आयेंगे तब तक विश्व शक्ति तो क्या , एक स्वतंत्र राष्ट्र बने रहना भी एक चुनौती है | वैश्वीकरण के इश युग में भी हमें सब क्षेत्रों में आत्म-निर्भर बनने की कोशिश करनी चाहिए | तभी तो गाँधी जी कहा था की अहिंसा एक मज़बूत का औज़ार है न की कायर और कमज़ोर का | सही मायने में ‘भारत में निर्मित’ अभियान तभी सफल होगा जब हम खुद की अलग सोच विकसित करने में कामयाब होंगे |

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