भाषा, अभिव्यक्ति और गणतंत्र


आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाये |

जब हम अपना ६६वां गणतंत्र दिवस मन रहे रहा तभी मन में एक बात कौंधी की हम किस दिशा की तरफ जा रहे है|

वाकिये एक किस्से से शुरू करते है| दरअसल हुआ ये की जब राजपथ पे परेड देख रहे थे तो एक महानुभाव जो कमेंट्री कर रहे थे उन्होंने कहा ‘ हम सब भारतीयों को घमंड होना चाहिए’ | परन्तु वास्तव में वो कहना चाह रहे थे की हम सब भारतीयों को गर्व होना चाहिए|

वैसे देखने में ये कोई बड़ी बात न लगे और शायद हो भी न | गलती हर किसी से हो सकतीहै और शायद ये भी एक छोटी भी भूल/गलती हो| पर ये एक बड़े बदलाव की और संकेत करता है जहाँ हम अपनी मातृ भाषा से नियंत्रण खो रहे है | ये सिर्फ महानुभाव तक सीमित अनुभव नहीं है जो अपनी कमेंटरी में कई बार ऐसे सबको का प्रयोग कर रहे थे जो हिंदी में पूरा अर्थ ही विपरीत सा प्रतीत हो रहा था | रोजमरा की जिंदगी में भी हमें ये देखने को मिलता है|

बहुत बार खुद को भी लगता है की हम अंग्रेजी के सबको को हिंदी में नहीं बोल पाते | हम पानी बात को सही तरीके से अपनी मातृ भाषा में ही नहीं व्यक्त कर पाते | इस से कभी -कभी आत्म ग्लानी भी होती है | हम जरुर अपनी भाषा से अपनी पकड़ खो रहे है | इसके पीछे मुझे कई कारण है | मेरे अनुसार कुछ कारण निम्न है

  1. शिक्षा व्यवस्था जिसमे गुणवतापुर्वक शिक्षा सिर्फ अंग्रेजी में उपलब्ध होना
  2. अंग्रेजी का बाहुल्य व हिंदी भाषा के में अधिक अवसर न होना
  3. भारतीये चीजों को ज्यादा मान सामान ने देने की प्रवर्ती व विदेशी को कुछ जरुरत से ज्यादा ही महत्व देना
  4. हमारी राजनेतिक व्यवस्था का लोगो की असली समस्या की तरफ ध्यान न देना | यही कारण है की हम भाषा केंद्रित राजनीती तो देखते है परन्तु भाषा के विकास के लिए कोई कम नहीं देखते
  5. धनाड्य वर्ग (खासकर राजनेतिक , नौकरशाह ) का अंग्रेजी पे अच्छी पकड़ होना – इस से उनका एक निहित स्वार्थ छिपा है की हिंदी को प्रशाशन और शिक्षा में बढावा ना दे ताकि आम लोग उनसे बराबरी न कर सकते और वो अपना आधिपत्य बनाये रखे|
  6. वैश्विक स्तर पर अंग्रेजी का दब दबा होना

ये एक कटु सच है की आज के वैश्विक युग में हम नाही अंग्रेजी को नकार सकते और नाही पूरी तरह से हिंदी को अपना सकते है | इस के पीछे एक बड़ा कारण ये भी है की आज का वैश्विक व्यापर और लेनदेन अंग्रेजी में ही होता है | विश्व में आपस में ज्ञान के आदान प्रदान की भाषा भी अंग्रेजी है| यहाँ तक की ये विषय वस्तु भी रोमन लिप में लिख के उसका अनुवाद करके लिखनी पद रही है|

परन्तु हमें ये भी याद रखना होगा की हमारी बहुत सारी समस्याओं और कमजोरियों के पीछे भाषा का भी एक योगदान है | आज के दिन हमें कुछ अमूल-चूक चीजों पे विचार करने की जरुरत है | क्या स्कूल में पढाई के निम्न स्तर के लिए भाषा और उसका माध्यम एक हद तक जिम्मेदार नहीं है ? क्या गणित और विज्ञानं बचे को मातृ भाषा में अच्छे से नहीं पढ़ा सकते ? क्या हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाने के लिए भाषा के मध्यम पे गहन विचार करने की जरुरत नहीं है ? क्या प्रशासन की भाषा आम लोगो की भाषा नहीं होनी चाहिए या वो भाषा होनी चाहिए जो सिर्फ १०% लोग भी आराम से नहीं बोल सकते और नाही अच्छे से समझ सकते है ? क्या हम हिंदी के बिना भी एक विकसित राष्ट्र का सपना पूरा कर सकते है ? क्या हिंदी इस सुचना और प्रद्योगिकी के युग में एक प्रभावी और उपयोगी भाषा के रूप में उभर सकती है या फिर हमें अंग्रेजी पे ही निर्भर होना पड़ेगा| हमें इन सब विषयों पे गहन विचार विमश करने की जरुरत है |

हमें ये भी सोचने की जरुरत है की अंग्रेजी भाषा के बड़ते प्रचलन के बावजूद , हम क्यों कोई बड़ा आविष्कार/खोज नहीं कर पा रहे है ? क्यों हम तकनीकी के लिए हमेशा विदेशो पे ही निर्भर रहते है ?  क्यों हमें अपनी सुरक्षा के लिए भी दूसरे देशो पे निर्भर रहना पड़ता है ? क्यों हमें परमाणु ऊर्जा के लिए अमेरिका और रूस के आगे हाथ फलने पड़ते है ? क्या हम थोरियम , जिसके अथाकभंडार भारत में है , को विकसित कर (ऊर्जा के स्त्रोत के रूप में )सकते है ?

शायद इन सब के लिए कुछ हद तक हिंदी/ अंग्रेजी की बहस भी जिम्मेदार हो! क्या विदेशी भाषा में दिशा निर्देश(पढाई) उत्पादकता कम कर देती है ? क्या विदेशी भाषा हमें एक रचनात्मक सोच की क्षमता में बाधा साबित होती है ?

कुछ विचारों अनुसार ,‘संज्ञानात्मक’ कौशल/क्षमता अपनी भाषा में अच्छे से विकसित किया जा सकती है | इस से बच्चों में रचनात्मकता, नवाचार और सिखने की लालसा व भावना भी अच्छे से विकसित की जा सकती है| उनके अनुसार , बेहतर ये होगा की शुरूआती वर्षों में सिर्फ “संज्ञानात्मक क्षमताओं” के विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाए और एक निश्चित स्तर के बाद, भाषा कौशल प्रदान किया जाए | विभिन् भाषा कौशल के बावजूद बुनियादी शिक्षा मातृभाषा में ही होनी चाहिए।

एक तरफ हम कहते है की हमारे यहाँ ‘नवाचार’ नहीं हो रहा परन्तु दूसरी तरफ कोई भी रचनात्मक सुझाव को हम सिरे से ख़ारिज कर देते है | किसी को पुराने/ रुदिवादी कह के तो तो किसी को बहुत ही क्रन्तिकारी कह के | शायद ये हमारी शिक्षा प्रणाली का ही प्रभाव है की हमारा दिमाग कोई नए सुझाव या तरीके के लिए असल में खुला ही नहीं होता | जो हम से सहमत नहीं होता उसे हम अपना दुश्मन मान बैठते है |

आज के दिन जब हिंदी व अंग्रेजी दोनों के बारे में मान्येताये बदल रही है , जब देश के मंत्री परिषद में ज्यादातर सिर्फ भारत में पढ़े लोग है , जब सुचना प्रद्योगिकी उद्योग की वैश्विक कंपनिया हिंदी भाषा पे जोर दे रही है तो क्या हिंदी के प्रयोग को बढाने और देश के एक बड़े तबके की जरुरत को पूरा करने के लिए व उनकी काबिलियत को अच्छे से प्रयोग करने के लिए हम सब क्या कर सकते है ?

मेरी ऊपर की बातों का ये मतलब कतई ये नहीं है की हमें सिर्फ हिंदी को ही बढावा देना है फिर किसी क्षेत्रिये भाषा या अंग्रेजी को कम महत्व देना है | सबका अपना-अपना महत्व होता है और हिंदी का अपना महत्व है | यहाँ हिंदी मैंने मातृ भाषा के सन्दर्भ में किया है ना कि सिर्फ हिंदी भाषा के लिए |

आज इस गणतंत्र दिवस के मौके के दिन जरुरत इस बात की है की हम एक खुले मन से भाषा के मुद्दे पे एक व्यापक बहस करके किसी आम सहमति पर पहुंचे | जब हम सही मायने में आत्म निर्भर हो जायेंगे तभी असली गणतंत्र की प्राप्ति होगी !

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